Sunday, 5 August 2018

शब्दों की तासीर



शब्‍दों की भी अपनी तासीर होती है। कितना अच्‍छा हो अगर हम सन्‍दर्भ के अनुसार सटीक शब्‍दों का प्रयोग करें। इसी कोशिश में इस पोस्‍ट में आम बोलचाल के शब्‍दों को उनकी विशिष्ट भावभूमि के साथ प्रस्‍तुत कर रही हूँ: 

1. 'नमस्ते' और 'नमस्कार'   

दोनों ही शब्‍द किसी का अभिवादन करने के लिए प्रयुक्त होते हैं। नमस्‍ते और नमस्‍कार में प्रयोग की दृष्टि से कोई खास अंतर नहीं है, फिर भी भाषाई संरचना के क्रम में समझने का प्रयास करें तो दोनों शब्‍द बिल्‍कुल समान भी नहीं हैं। इनका संधि विच्‍छेद करें तो नमस्‍तेका संधि विच्‍छेद होगा नम:+ते जबकि नमस्‍कार का संधि विच्‍छेद होगा, नम:+कार। नम:एक संस्‍कृत शब्‍द है जिसका अर्थ है, किसी को नमन करना,किसी के समक्ष सिर नवाना या झुकना तो नमस्‍ते और नमस्‍कार, दोनों ही शब्‍दों में नमन का भाव है।

दोनों शब्‍दों में फर्क तेऔर कारका है। अब इन्‍हें समझने की कोशिश करते हैं। पहले बात नमस्‍ते की। संस्कृत में 'तुम्हारे लिए' को 'तुभ्यं' कहते हैं, उसी का वैकल्पिक संक्षिप्त रूप 'ते' है। इस प्रकार नम:+ते=नमस्ते का अर्थ हुआ 'तुम्हारे लिए नमन' या 'तुम्हें नमन'। दरअसल संस्कृत में यह नियम है कि जब भी आप किसी को नमन' करते हुए नमः शब्द का प्रयोग करते हैं तो जिसे नमन किया जाता है, उसकी चतुर्थी विभक्ति लगानी होती है, जैसे ओम नमः शिवाय में 'शिवाय' में चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग किया गया है। इसी तर्ज पर 'तुभ्यं' या 'ते' भी युष्‍मद् शब्‍द (हिन्‍दी में तुम) की चतुर्थी विभक्ति है।

वहीं 'नमस्कार' में जो 'कार' है वह एक संज्ञा है जिसका अर्थ है, कार्य या क्रिया। जैसे चमत्कृत करने का कार्य हुआ चमत्कार, उपकृत करने का कार्य हुआ उपकार, स्‍वीकृत करने का कार्य हुआ स्‍वीकार, अहं करने का कार्य हुआ अहंकार। तो ठीक ऐसे ही नमन करने का कार्य हुआ, नमस्कार।
इस प्रकार दोनों शब्‍दों को लेकर एक रोचक बात यह सामने आती है कि नमस्कार एक शब्द है जबकि नमस्ते पूरा का पूरा एक वाक्य। नम:+ते यानी तुम्‍हें मेरा नमस्‍कार है।   

जहां तक दोनों शब्‍दों के प्रयोग का सवाल है, नमस्कार हमउम्र लोगों को किया जाता है जबकि नमस्ते किसी को भी किया जा सकता है, फिर चाहे वह आपसे बड़ा हो या छोटा। अपने से बड़ों के लिए प्रणाम तो नि‍र्धारित है ही। संस्कृत के श्लोकों में भी आपको माता, पिता या गुरु के संदर्भ में नमस्ते ही पढ़ने को मिलेगा नमस्कार नहीं।

इसी प्रकार किसी मंच आदि पर लोगों को संबोधित कर रहे हों तो नमस्कार ही कहना चाहिए क्‍योंकि ऐसे में अलग-अलग उम्र के लोगों के होने की संभावना होती है। साथ ही, नमस्‍ते में प्रयुक्‍त ते एकवचन है। इसलिए भी इस शब्‍द का प्रयोग एक व्‍यक्ति का अभिवादन करने के लिए शुद्ध होगा।     

  1.  ‘आमन्‍त्रण और नि‍मन्‍त्रण  
 आमन्‍त्रण और नि‍मन्‍त्रण, दोनों ही शब्‍दों का प्रयोग किसी कार्यक्रम, उत्‍सव आदि में किसी को बुलावा देने के लिए किया जाता है। ये तत्‍सम शब्‍द अर्थात् संस्‍कृत के ऐसे शब्‍द हैं जो अपरिवर्तित रूप में हिन्‍दी भाषा में विद्यमान हैं, इसलिए इनकी वाक्‍य संरचना को कुछ इस प्रकार से समझें: आ उपसर्ग+मन्‍त्र् धातु+ल्‍युट् प्रत्‍यय = आमन्‍त्रण और नि‍ उपसर्ग+मन्‍त्र् धातु+ल्‍युट् प्रत्‍यय = नि‍मन्‍त्रण। चूंकि ये संस्‍कृत शब्‍द हैं, इसलिए इनमें संस्‍कृत के उपसर्ग-प्रत्‍यय प्रयुक्‍त हुए हैं और संस्‍कृत की ही मन्‍त्र् धातु (क्रिया) का प्रयोग हुआ है।

जैसा कि मन्‍त्र वह शब्‍द या शब्‍द समूह है जिसका जाप दिव्‍य या अलौकिक शक्तियां प्राप्‍त करने या देवताओं का स्‍मरण/आह्वान करने के लिए किया जाता है। इसी प्रकार आमन्‍त्रण और नि‍मन्‍त्रण में प्रयुक्‍त मन्‍त्र् शब्‍द भी किसी कार्यक्रम, दावत आदि में मेहमानों को आहूत करने या उन्‍हें बुलावा देने के संदर्भ में प्रयुक्‍त होता है।

अब दोनों शब्‍दों को भिन्‍न बनाने वाले ‘‍ और नि‍ उपसर्गों की बात। विभिन्‍न उपसर्ग विभिन्‍न अर्थ रखते हैं। 

उपसर्ग का एक अर्थ अपनी ओर है, जैसे कि आकर्षण अर्थात् अपनी ओर खींचना। आमंत्रण शब्‍द में भी यह इसी अर्थ में प्रयुक्‍त हुआ है। आमंत्रण यानी अपनी ओर बुलाना या अपने कार्यक्रम में बुलावा देना। 


वहीं अन्‍य अर्थों के साथ ही नि‍ उपसर्ग किसी शब्‍द के अर्थ को घनत्‍व देने के लिए भी प्रयुक्‍त होता है, जैसा कि नि‍वेश’, नि‍देश आदि शब्‍दों में। नि‍मन्‍त्रण में भी यह बुलावे के नि‍वेदन को घनत्‍व देता है। इसी प्रकार नि‍ का अर्थ बहुत बड़ा भी होता है, जैसे नि‍कुंज अर्थात् बहुत बड़ा लता-मण्‍डप। इस प्रकार बड़े स्‍तर पर बुलावा देना, जिसमें भोज आदि शामिल हों, नि‍मंत्रण है।   
   
इस प्रकार मूल धातु (मन्‍त्र्) समान होते हुए भी  और नि‍ अलग-अलग उपसर्ग लगने से इन दोनों शब्‍दों के अर्थ में भिन्‍न रूप से विशिष्‍टता आती है। दोनों ही शब्‍द किसी व्‍यक्ति को किसी कार्यक्रम, उत्‍सव आदि में सम्मिलित होने का नि‍वेदन करने के लिए प्रयुक्‍त होते हैं लेकिन नि‍मंत्रण में आप उस व्‍यक्ति को खाने-पीने, भोजन-नाश्‍ते आदि के लिए भी आमंत्रित करते हैं जबकि आमंत्रण में दावत का भाव नहीं होता। इसलिए जब आप किसी को मंच पर कविता, भाषण आदि के लिए बुलाते हैं, तो उसे आमंत्रित करते हैं, नि‍मंत्रित नहीं जबकि किसी को शादी-पार्टी आदि में बुलावा देते हैं, या किसी ऐसे समारोह में शरीक होने का न्‍योता देते हैं जहां थोड़े भी जलपान की व्‍यवस्‍था हो, तो उसे नि‍मंत्रित करते हैं। यही वजह है कि विवाह आदि में नि‍मंत्रण पत्र भेजे जाते हैं, आमंत्रण पत्र नहीं। सरल शब्‍दों में दावत का बुलावा नि‍मंत्रण है।

पर ऐसा नहीं है कि जहां जलपान की व्‍यवस्‍था हो, वहां  आमंत्रण पत्र हो ही नहीं सकते। दरअसल, औपचारिक कार्यक्रमों में अतिथियों, वक्‍ताओं, विशेषज्ञों को आमंत्रित करने के लिए आमंत्रण पत्र ही छपवाए जाते हैं। इनकी खासियत यह होती है कि ये अहस्‍तांतरणीय होते हैं अर्थात् जिस गणमान्‍य व्‍यक्ति के नाम से कार्ड है, वही कार्यक्रम में भाग ले सकता है, उसकी जगह कोई और नहीं। जैसे हिन्‍दी पखवाड़े, स्‍वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस समारोह आदि के कार्यक्रमों में बुलाए गए वक्‍ताओं को आमंत्रण पत्र देकर कार्यक्रम में भाग लेने के लिए अधिकृत किया जाता है। तब वे अपनी जगह अपने प्रति‍नि‍धि को वक्‍ता के तौर पर नहीं भेज सकते। साथ ही, ऐसे आमंत्रण पत्रों का मसौदा तय होता है जिसमें कार्ड में पहले ही आयोजन स्‍थल का पता, दिनांक, समय, कार्यक्रम में भाग ले रहे अन्‍य मुख्‍य लोगों के नाम छपे रहते हैं।

महत्त्वपूर्ण बात यह कि इन आमंत्रण पत्रों को नि‍मंत्रण पत्र नहीं लेकिन रीतिक नि‍मंत्रण पत्र भी कहा जाता है।

पुनश्‍च: न्‍योता शब्‍द नि‍मंत्रण से ही व्‍युत्‍पन्‍न है। 

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  1. कार्यवाही और कार्रवाई

बहुत बार इन दोनों शब्‍दों का समान संदर्भों में प्रयोग देखने में आता है लेकिन वास्‍तव में ये दोनों अलग-अलग अर्थ रखने वाले वाले दो भिन्‍न शब्‍द हैं। कार्यवाही संस्‍कृत के शब्‍द कार्यवाहिन् से बना है और अंग्रेज़ी के ‘Proceedings’ का पर्याय है।  वहीं, कार्रवाई शबद फारसी के काररवाई से आया है जो अंग्रेज़ी के ‘Action’ का समानार्थी है। दूसरे शब्‍दों में कार्रवाई मूल रूप से फारसी की संज्ञा (काररवाई) का हिन्‍दी संज्ञा रूप है जबकि कार्यवाही संस्‍कृत की संज्ञा है।  

अर्थ स्‍पष्‍टता के लिए इन शब्‍दों को कुछ उदाहरणों के साथ देखते हैं: सांसदों के शोर-शराबे के कारण सदन की कार्यवाही (Proceedings) एक घंटे के लिए स्‍थगित करनी पड़ी या अदालत की कार्यवाही में बाधा डालने की कोशिश करने वालों को तुरंत गिरफ़्तार करने के आदेश दिए गए वैसे, आजकल कार्यवाही शब्‍द अदालती और विधिक कामकाज़ के लिए रूढ़ हो गया है। इस प्रकार जब आप किसी बैठक का कार्यवृत्त  बनाते हैं या किसी सभा आदि में हुए कार्य का लिखित वर्णन तैयार करते हैं तो पहले उसकी कार्यवाही नोट करते हैं। 

वहीं कार्रवाई शब्‍द action/ disciplinary action के लिए प्रयुक्‍त होता है। मसलन, अगर किसी कार्यालय में आपका कोई काम अटका हुआ है तो आप वहाँ के अधिकारियों से उससे संबंधित कार्रवाई (action) तेज़ करने का अनुरोध कर सकते हैं और अगर कोई अधिकारी उस काम के एवज़ में रिश्‍वत चाहता है तो आप किसी उच्‍चतर अधिकारी से उसके खिलाफ़ कार्रवाई 
(disciplinary action) की अपेक्षा रख सकते हैं या इस संबंध में शिकायत कर सकते हैं।
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4. गिरि, गिरी और गीरी      

इस साल ऑक्‍सफोर्ड के अंग्रेज़ी शब्‍दकोश में शामिल किए 70 नए हिन्‍दी शब्‍दों में से एक है, दादागीरी जिसे बहुत-से लोग दादागिरी लिखते हैं। कहीं-कहीं तो दादागिरि भी पढ़ने को मिलता है। सही शब्‍द दादागीरी है। दरअसल गिरि‍, गिरी और गीरी अलग-अलग अर्थों वाले तीन अलग-अलग शब्‍द हैं।

गिरि का अर्थ है, पहाड़ या पर्वत। यही वजह है कि पहाड़ों के राजा हिमालय को गिरीश (गिरि+ईश)गिरीन्‍द्र (गिरि+इन्‍द्र) या गिरिराज (गिरि+राज) कहा जाता है और कैलाश पर्वत के स्‍वामी भगवान शिव भी गिरीश या गिरीन्‍द्र कहलाते हैं। इसी कारण हिमवान पर्वत की पुत्री पार्वती गिरिजा (गिरि से जन्‍म लेने वाली) या गिरिनंदिनी (गिरि की बेटी) कहलाती हैं। इसी प्रकार गोवर्धन पर्वत को उठा लेने वाले भगवान श्रीकृष्‍ण को गिरिधर या गिरिधारी (गिरि को धारण करने वाले) कहा जाता है।

वहीं गिरी शब्‍द का अर्थ है, किसी फल आदि का छिलका या बीज तोड़ने पर नि‍कलने वाला हिस्‍सा या गूदा। उदाहरण के लिए बादाम, अखरोट आदि की गिरी या फिर नारियल को तोड़ने पर नि‍कलने वाला सफेद-मुलायम गूदा।

अब बात गीरी की। उर्दू में गीर का अर्थ है, पकड़ने वाला, अ‍पने अधिकार में रखने वाला, जीतने या छीनने वाला। जैसे, जहाँगीर (पूरे जहान् पर अधिकार रखने वाला),आलमगीर (पूरी दुनि‍या पर अधिकार रखने वाला) या फिर राहगीर (राह पकड़ने वाला)। इसी प्रकार गीरी एक उर्दू प्रत्‍यय है जिसका अर्थ है, काम या पेशा। उदाहरण के लिए नेतागीरी (नेतृत्‍व का काम), बढ़ईगीरी (बढ़ई का काम), दादागीरी (स्‍वयं को बड़ा या रौब वाला दिखाने का काम) या फिर गाँधीगीरी (गाँधी जी के आदर्शों पर चलने का काम)।

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5. विमोचन, लोकार्पण और उद्घाटन  

तीनों ही शब्‍द किसी वस्‍तु या संरचना को सार्वजनि‍क क्षेत्र में लाने के लिए प्रयोग किए जाते हैं लेकिन इनके प्रयोग की भावभूमि में बहुत फर्क है जिसे इन शब्‍दों की संरचना से समझा जा सकता है।

विमोचन एक संस्‍कृत शब्‍द है जिसे इस प्रकार समझना चाहिए, वि+मुच्+ल्‍युट् प्रत्‍यय वि एक उपसर्ग है जिसका अर्थ विशेष या भिन्‍न होता है। मुच् संस्‍कृत की धातु (क्रिया) है जिसका अर्थ है, मुक्‍त करना जबकि ल्‍युट् संस्‍कृत का एक प्रत्‍यय है। इस प्रकार विमोचन का अर्थ हुआ, किसी बंधन, कैद, कष्‍ट या विपत्ति से मुक्‍त करवाना, छुड़ाना, छोड़ना या छुटकारा दिलाना। जैसे कष्‍टों से मुक्‍त करवाने या छुटकारा दिलाने वाले हनुमान कहलाते हैं, संकटमोचक। इसी प्रकार घोड़ागाड़ी, बैलगाड़ी आदि से इन पशुओं को अलग करना हुआ इन पशुओं का विमोचन। इसी प्रकार धनुष से बाण छोड़ना हुआ, बाण का विमोचन और ऋण से मुक्ति पाना हुआ ऋण मोचन। इस शब्‍द की गहराई में थोड़ा और जाएं तो मरे हुए जानवर की चमड़ी या चर्म छुड़ाने वाला चर्मकार या मोची हुआ।  

लोकार्पण का अर्थ तो स्‍वयं यह शब्‍द ही स्‍पष्‍ट कर देता है। यह दो शब्‍दों लोक और अर्पण से बना एक सामासिक पद है जिसका अर्थ है, लोक या संसार को कुछ अर्पित करना। यही वजह है कि पुस्‍तकों, बाँधों, पुलों का लोकार्पण किया जाता है। हालाँकि, पुस्‍तकों के संदर्भ में विमोचन शब्‍द का प्रयोग भी होता है, लेकिन वह अर्थ के लिहाज़ से सही नहीं लगता। किताब को किसी कैद से नहीं छुड़ाया जा रहा बल्कि बाज़ार में बेचने से पहले लोगों को अर्पित किया जा रहा है। इसलिए पाठक और लेखक में संवाद कायम करने वाले समारोह हुए,लोकार्पण समारोह।

चूँकि विमोचन का एक अर्थ गाँठ या बन्‍धन खोलना भी है और पुस्‍तक को एक विशेष आयोजन करके अर्थात् रिबन आदि काटकर लोकार्पित किया जाता है, शायद इसलिए इसे पुस्‍तक विमोचन कहा जाने लगा हो किन्‍तु यह तर्कसंगत प्रयोग नहीं है क्‍योंकि इस रिबन काटने में किताब को बंधन से मुक्‍त करने का भाव नहीं होता।  

इसी प्रकार उद्घाटन शब्‍द के विभिन्‍न अर्थों में से एक अर्थ है, कोई नया कार्य आरंभ करने का औपचारिक समारोह। जैसे, पुल/बांध/अधिवेशन आदि का उद्घाटन।

इस शब्‍द को उद्+घट्+णिच्+ल्‍युट् के रूप में टुकड़े करके समझना आसान होगा। उद् या उत् एक संस्‍कृत उपसर्ग है, जिसका अर्थ है ऊपर। जैसे, उत्तिष्ठति यानी उठता है। वहीं घट् धातु का एक अर्थ है, प्रयास करना। शेष तो संस्‍कृत प्रत्‍यय हैं ही। यह जानकर इस शब्‍द को समझना और आसान हो जाएगा कि कुएं से पानी खींचने वाली रस्‍सी और घड़े को संस्‍कृत में उद्घाटन कहते हैं यानी जिससे पानी ऊपर लाने की चेष्‍टा की जाती है। इसी प्रकार इस शब्‍द का एक अर्थ उघाड़ना, प्रकट करना या अनावृत करना है, जैसे रहस्‍य का उद्घाटन करना या उसे सतह पर लाना। इसका एक अर्थ खोलना भी है, जैसे द्वार का उद्घाटन।

इस प्रकार पुस्‍तक के संदर्भ में लोकार्पण ठीक होगा, लेकिन बांध, पुल आदि के संदर्भ में लोकार्पण और उद्घाटन दोनों का ही प्रयोग सही है।

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6. ख्‍यात, विख्‍यात, प्रख्‍यात और कुख्‍यात 

तीनों ही शब्‍द संस्‍कृत धातु ख्‍या से बने हैं, जिसका अर्थ है, कहना। पहले बात ख्‍यात की। इस शब्‍द को यूं समझें, ख्‍या धातु+क्‍त प्रत्‍यय। इस प्रकार इसका अर्थ हुआ, जिसके बारे में कहा गया हो या जो इस प्रकार कहे या चर्चा किए जाने के कारण जाना-माना हो, प्रसिद्ध हो। इस प्रकार क्‍त प्रत्‍यय ख्‍या धातु या क्रिया में जुड़कर उसे ख्‍यात बनाता है जो कि एक विशेषण है। उदाहरण: ख्‍यात घटना। इसी प्रकार ये भी समझें: ख्‍या+क्तिन् = ख्‍याति, +ख्‍या+ल्‍युट्=आख्‍यान और वि+ख्‍या+ल्‍युट्=व्‍याख्‍यान।

इसी प्रकार विख्‍यात को भी समझा जा सकता है: वि+ख्‍या+क्‍त ख्‍या धातु में वि उपसर्ग और संस्‍कृत का क्‍त प्रत्‍यय लगाने से बनता है, विख्‍यात। वि एक संस्‍कृत उपसर्ग है जो किसी शब्‍द के पहले जुड़कर उसे विशेष, अलग या अभाव का अर्थ देता है। जैसे, विज्ञान यानी विशेष ज्ञान, विस्‍मरण यानी स्‍मरण का अभाव या फिर बिसराना, विदेशी यानी अलग देश वाला आदि। इस प्रकार विख्‍यात का अर्थ हुआ, जिसके बारे में विशेष रूप से कहा जाए, चर्चा आदि की जाए यानी प्रसिद्ध, मशहूर।

अब प्रख्‍यात को देखें: प्र+ख्‍या धातु+क्‍त प्रत्‍यय प्र भी संस्‍कृत का ही एक उपसर्ग है जो अधिक या आगे का भाव देता है। जैसे, प्रचलन यानी जिसका चलन अधिक हो। इस प्रकार प्रख्‍यात का अर्थ हुआ, जिसके बारे में अत्‍यधिक कहा जा रहा हो, चर्चा की जा रही हो यानी मशहूर, प्रसिद्ध।

इस तरह हमने देखा कि प्रख्‍यात और विख्‍यात में कोई खास अंतर नहीं है, क्‍योंकि भिन्‍न-भिन्‍न उपसर्गों के कारण इनके शाब्दिक अर्थ में भले ही फर्क आ गया हो पर भाव ये एक ही देते हैं।   

इसी प्रकार कुख्‍यात को भी समझा जा सकता है। कु उपसर्ग बुरे का अर्थ देता है। जैसे, कुकर्म यानी बुरा कर्म तो कुख्‍यात का अर्थ हुआ, जिसके बारे में बुरा कहा या बोला जाए यानी बदनाम।

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7. साधुवाद और धन्‍यवाद  

ये दोनों शब्द क्रमशः धन्य और साधु के साथ वाद शब्द का समास करने पर बने हैं। साधुवाद और धन्‍यवाद में वाद शब्‍द उभय‍नि‍ष्‍ठ (common) है, इसलिए पहले इसी की बात करते हैं। संस्‍कृत की वद् धातु से वाद बना है। वद् का अर्थ है, कहना या बोलना और इस तरह सेवाद का इस संदर्भ में अर्थ नि‍कला, बात। जैसे संत कबीर ने कहा, पंडित वाद वदंते झूठा
इस तरह से धन्‍यवाद का अर्थ हुआ, किसी को धन्‍य कहना या ऐसी बात जिसके ज़रिए किसी को धन्‍य कहा जाए। इसी तरह से साधुवाद का मतलब हुआ किसी को साधु कहना या ऐसी बात जिसके ज़रिए किसी को साधु कहा जाए।
हम सभी जानते हैं कि धन्‍यवाद कृतज्ञता ज्ञपित करने वाला शब्द है यानि जब हम पर कोई किसी तरह का उपकार करता है तो कृतार्थ होकर हम उसे धन्यवाद कहते हैं। वहीं साधु एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ अच्छा, उत्तम या सज्जन है तो जब कोई अच्छा कार्य करता है तो उसकी सराहना में साधुवाद कहा जाता है और उसे शाबाशी दी जाती है। संन्यासियों को भी साधु उनके अच्छे आचरण के लिए ही कहा जाता है।
इस लिहाज़ से आप किसी से कृतार्थ होने पर उसे साधुवाद भी कह सकते हैं पर यदि किसी ने आपका निजी हित किया है तो उसे धन्यवाद कहना ही भाषा की दृष्टि से ठीक होगा पर अगर कोई व्यापक हित में अच्छा काम करता है तो उसकी वाहवाही करते हुए साधुवाद कहा जा सकता है, जैसे किसी पत्रिका के बढ़िया प्रकाशन पर आप उसके संपादक मण्डल को साधुवाद कह सकते है।
अंग्रेज़ी में इसे ‘expression of gratitude’ और ‘expression of appreciation’ के रूप में समझ सकते हैं।   
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8. पूर्व, भूतपूर्व और अभूतपूर्व 

पूर्वहम सभी के लिए एक जाना-पहचाना शब्‍द है जिसका अर्थ है, पहले का, पिछला, प्राचीन, गत आदि। जैसे, पूर्वगामी (आगे या पहले चलने वाला), पूर्वकथित (पहले कहा गया), पूर्व नि‍र्धारित (पहले से नि‍र्धारित), पूर्वजन्‍म (पिछला जन्‍म) आदि-आदि।

वहीं भूतपूर्वका अर्थ है, जो पहले किसी पद पर रह चुका हो। जैसे, भूतपूर्व प्रधानमंत्री, भूतपूर्व कुलपति आदि-आदि। यूं तो दोनों शब्‍दों में कोई उलझन नहीं है लेकिन आजकल देखने में आ रहा है कि अखबार वगैरह में भू‍तपूर्व की जगह पूर्व ही लिखा जाने लगा है;  पूर्व राष्‍ट्रपति, पूर्व मुख्‍यमंत्री आदि-आदि और यहीं इन दोनों शब्‍दों की सूक्ष्‍म पड़ताल की ज़रूरत महसूस होती है।

दरअसल, भूतपूर्व का प्रयोग इस सोच के चलते नहीं किया जा रहा है कि इस शब्‍द में अर्थ का दोहराव है। भूतका अर्थ भी विगतहै (जैसे कि भूतकाल) और पूर्वका अर्थ भी वही तो इस शब्‍द को अर्थ दोहराव के कारण अशुद्ध माना जा रहा है जबकि ऐसा कतई नहीं है। दरअसल, संस्‍कृत की समझ की कमी के कारण यह भ्रम पैदा हुआ है।

इस शब्‍द की सार्थकता को समझने के लिए इसका समास विग्रह करना होगा जो संस्‍कृत में इस प्रकार होगा, ‘पूर्वं भूत:यानी जो पहले (पूर्वं) हो/रह (भूत:) चुका हैपूर्वंका अर्थ पहले है जबकि भूत:संस्‍कृत धातुभूसे बना है। भू यानी होना, to be.  इस प्रकार भूतपूर्व शब्‍द के टुकड़े करने पर इसका मतलब यूं समझ आता है, जो पहले हो/रह (be) चुका है। इस प्रकार भूतपूर्व लिखने से ही ‘former’ का पूरा आशय स्‍पष्‍ट होता है, सिर्फ पूर्व लिख देना पर्याप्‍त नहीं है।

यह शब्‍द संस्‍कृत के सबसे बड़े वैयाकरण और अष्‍टाध्‍यायी के रचयिता पाणिनि‍‍ के समय से ही इसी संदर्भ में प्रयुक्‍त होता आ रहा था। प्रमाण हैं कि पाणिनी ने स्‍वयं इसका इसी अर्थ में प्रयोग किया है।

उपर्युक्‍त से अभूतपूर्वका अर्थ तो खुद ही स्‍पष्‍ट हो गया है, यहां उपसर्ग अभावअर्थ में प्रयुक्‍त हुआ है। पूरे शब्‍द का अर्थ उल्‍टा चलते हुए समझें, पहले हुआ न हो कभी जैसा, वैसा यानी अनोखा, विलक्षण। उदाहरण: अभूतपूर्व सफलता। 

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9. सिंहावलोकन और विहगावलोकन  

दोनों शब्द स्वतः स्पष्ट हैं, फिर भी अक्सर इनके प्रयोग में चूक हो जाती है। सिंहावलोकन और विहगावलोकन, दोनों ही शब्‍दों का प्रयोग किसी कार्य या परिस्थिति को देखने-समझने के लिए किया जाता है लेकिन बिल्‍कुल अलग संदर्भों में। सबसे पहले बात इन दोनों शब्‍दों में उभय‍नि‍ष्‍ठ (common) ‘अवलोकनकी। यह एक संस्‍कृत शब्‍द है जिसका अर्थ है, देखना। 

अब पहले सिंहावलोकन को समझने का प्रयास करते हैं। यह दो शब्‍दों सिंह तथा अवलोकन के समास से बना है। इस तरह से समझें तो सिंहावलोकन का मतलब हुआ, सिंह या शेर की तरह देखना। शेर की यह आदत होती है कि वह हमेशा पीछे देखते हुए, जिस रास्‍ते से वह गुज़रा है उसके चप्‍पे-चप्‍पे पर नज़र बनाकर रखते हुए पूरी सतर्कता के साथ आगे बढ़ता है इसलिए सिंहावलोकन का अर्थ हुआ, पहले घट चुके को देख-समझकर, आगे के हालात का सूक्ष्म निरीक्षण और वर्णन करना

वहीं, विहगावलोकन दो शब्‍दों, विहग और अवलोकन के समास से बना है विहगएक संस्‍कृत शब्‍द है जिसका है, पक्षी। इस प्रकार विहगावलोकनका मतलब हुआ, पक्षी की तरह ऊपरी या सरसरी तौर पर देखते हुए आगे बढ़ना। पक्षी जब आसमान में उड़ता है तो एक लम्‍बी दूरी तय करता है और कितनी ही चीज़ों, दृश्‍यों आदि पर दृष्टिपात करते हुए आगे बढ़ता चलता है। प्रसंगवश विहंगम और विहंगम दृश्‍य का अर्थ भी समझा जा सकता है। विहंग का अर्थ भी पक्षी ही होता है। इसलिए विहंगम का मतलब है, विहंग की तरह मंज़ि‍ल तक सीधे और तेज़ी से जाना जबकि विहंगम दृश्‍य हुआ, जैसा दृश्‍य आसमान से पक्षी को उड़ते हुए दिखाई देता है, जिसमें चीज़ें स्‍थूल रूप में दिखाई देती हैं, उनका सूक्ष्‍म विवरण नहीं पता चलता, वैसा ही दृश्‍य।

इसलिए जब नेता, अधिकारी आदि बाढ़, अकाल का हवाई जायज़ा लेते हैं तो वे परिस्थितियों का विहगावलोकनकरते हैं, ‘सिंहावलोकननहीं जबकि नीति निर्माता उपलब्‍ध संदर्भों का सिंहावलोकन करके ही किसी नीति को अंतिम रूप देते हैं। दोनों शब्दों के भेद को अङ्ग्रेज़ी के “bird’s-eye view” और ‘‘retrospection’’ से समझा जा सकता है। 
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10. उपदेश और प्रवचन 

संत-महात्मा उपदेश और प्रवचन देते हैं। दोनों शब्द एकार्थी ज़रूर लगते हैं लेकिन इनमें फर्क है।  पहले उपदेश शब्‍द को समझने की कोशिश करते हैं। यह शब्‍द संस्‍कृत उपसर्ग उप से दिश् धातु का योग होने पर बना है। उप का एक अर्थ होता है, समीप या नि‍कट। उदाहरण के लिए सोलह संस्‍कारों में से एक है, उपनयन संस्‍कार जिसके माध्‍यम से शिष्‍य को गुरु के पास ले जाया जाता है। वहीं उप उपसर्ग का एक अर्थ सहायक भी है। जैसे इस अर्थ में उप उपसर्ग के साथ कृ (करना) धातु मिलने पर उपकार बनता है। इस प्रकार उप उपसर्ग और दिश् धातु के योग से बने उपदेश का अर्थ हुआ, ‘पास बैठाकर दिशा या सही राह दिखाना, अच्छी शिक्षा देना या उचित मार्ग पर ले जाने वाली सहायक सलाह देना। इस प्रकार बड़ों या विद्वानों द्वारा सन्मार्ग पर ले जाने के लिए नेक सलाह देना ही उपदेश है।

वहीं, प्रवचन में प्र उपसर्ग और वच धातु है जिसका अर्थ है, कहनाप्र एक संस्‍कृत उपसर्ग है जिसका एक अर्थ है, विशेष रूप से। इस तरह प्रवचन का अर्थ हुआ, विशेष रूप से कहना या किसी ग्रंथ आदि का अर्थ विशेष विस्तार से समझाना। दोनों शब्‍दों का भेद और भी स्‍पष्ट हो जाएगा अगर आप इसे इस संदर्भ में समझेंगे कि संत-महात्मा विभिन्न नीति ग्रन्थों के अर्थ ही तो स्पष्ट करते हैं या उनकी व्याख्या ही तो करते हैं, जब हम उनका प्रवचन सुनते हैं। इस प्रकार प्रवचन’, उपदेशपूर्ण भाषण बन जाता है। इस प्रकार किसी के भी द्वारा पास बैठाकर दी गई नेक नसीहत उपदेश है जबकि नीति-धर्म आदि के पौराणिक ग्रन्थों या सूत्रों की व्याख्या के साथ उपदेशात्मक या कल्याणकारी भाषण देना प्रवचन है।
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11. 'भागना’ और ‘दौड़ना 
भागना’ और ‘दौड़ना’ रोज़मर्रा में प्रयोग किए जाने वाले आम शब्‍द हैं। हम इनका इस्तेमाल समानार्थी शब्‍दों के रूप में भले ही करते हों लेकिन वास्‍तव में इनमें अर्थ-साम्‍य होते हुए भी ये एकार्थी नहीं हैं।
दोनों शब्‍दों को उदाहरणों से समझने की कोशिश करते हैं। मान लीजिए कि आप ट्रेन से कहीं जा रहे हैं और रेलवे स्‍टेशन जल्‍दी पहुँचना चाहते हैं ताकि ट्रेन चलने से पहले खाने-पीने का सामान या पत्र-पत्रिकाएँ आदि खरीद सकें तो अपनी चाल तेज़ करने पर आप ‘दौड़ेंगे’ लेकिन यदि आपको पहले ही देर हो चुकी है और ट्रेन छूटने की नौबत आ गई है तो अपनी चाल तेज़ करने पर आप ‘भागेंगे’ अर्थात् डरआशंका आदि परिस्थितियों में यदि आप लंबे डग भरते हैं तो ‘भागते’ हैं और सामान्‍य परिस्थितियों में कहीं जल्‍दी पहुँचने के लिए अपनी चाल तेज़ करते हैं तो ‘दौड़ते’ हैं। 
यदि आप किसी के साथ रेस लगाएंगे तो दौड़ेंगे। इसी तर्क से समझें कि 100 मीटर दौड़, 200 मीटर दौड़, घुड़दौड़ आदि प्रतियोगिताएं होती हैं, 100 मीटर भाग, 200 मीटर भाग या घुड़भाग आदि प्रतियोगिताएं नहीं लेकिन अगर आप शेर देख लेंगे तो भागेंगे और खुदा ना खास्ता कभी भूकंप की आशंका होगी तो आप इमारत छोड़कर भागेंगे। सिर पर पैर रखकर भागना मुहावरे के संदर्भ में भी इसे समझा जा सकता है।
दोनों शब्‍दों में एक छोटा-सा लेकिन महत्त्वपूर्ण फ़र्क यह भी है कि ‘भागना’ मानसिक भी हो सकता है लेकिन ‘दौड़ना’ नहीं। अगर आपको किसी काम में दिलचस्‍पी नहीं तो आप उससे जी चुराते हैं, ‘भागते’ हैं पर उस काम से ‘दौड़ते’ नहीं। इसी तरह ज़ि‍म्‍मे‍दारियों से भागना कहा जाता है, दौड़ना नहीं।   
अंग्रेज़ी में समझना चाहें तो भागने को 'flee' के समानार्थी के तौर पर समझ सकते हैं, हालाँकि 'run' का प्रयोग दोनों ही संदर्भों में होता है।
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12. अन्‍तर्राष्‍ट्रीय और अन्‍तरराष्‍ट्रीय

कुछ लोग पहली वर्तनी को सही मानते हैं तो कुछ दूसरी को। दरअसल, दोनों ही वर्तनियां सही हैं क्‍योंकि ये दो अलग-अलग शब्‍द हैं। दोनों शब्‍दों को यूँ समझें: अंतर्+राष्‍ट्रीय=अंतर्राष्‍ट्रीय और अन्‍तर+राष्‍ट्रीय=अन्‍तरराष्‍ट्रीय।

पहले बात अंतर्राष्‍ट्रीय की। यहाँ राष्‍ट्रीय शब्‍द से पहले अन्‍तर् उपसर्ग जुड़ा है जिसका अर्थ है, अंदर या भीतर (intra/within)। इससे अन्तर्राष्ट्रीय का अर्थ हुआ, राष्ट्र या देश के भीतर। जैसे, अंतर्देशीय पत्र अर्थात् देश के भीतर पत्राचार के लिए काम में आने वाले  पत्र (inland letters)अंतर्द्वन्‍द्व’, ‘अंतर्भूमि’, आदि शब्दों में द्वन्‍द्व और भूमि से पहले अन्‍तर् उपसर्ग का प्रयोग देखा जा सकता है।  इस प्रकार इंटरनेशनल के अर्थ में अंतर्राष्‍ट्रीय शब्‍द का प्रयोग ठीक नहीं है।

इंटरनेशनल के लिए 'अन्‍तरराष्ट्रीय' शब्द का प्रयोग किया जाना चाहिए जोकि 'राष्ट्रीय' से पहले 'अन्‍तर' लगाने से बना है जिसका अर्थ है, दूरी’, बाहर काया के बीच (inter/between) इससे 'अन्‍तरराष्ट्रीय' का अर्थ हुआ, दो या दो से ज़्यादा देशों के बीच जैसे, 'अन्‍तरराष्ट्रीय' मसले। इस प्रकार जब एक राष्ट्र या देश का दूसरे राष्ट्र या देश से संबंध व्यक्त करना हो, तब अन्‍तरराष्ट्रीयया अन्‍तरदेशीयशब्‍द का प्रयोग किया जाना चाहिए।

एक राज्‍य से दूसरे राज्‍य के संबंध अन्‍तरराज्‍यीय या अन्‍तरप्रदेशीय लेकिन अंतर्देशीयहोंगे। इसी तरह रूस से भारत के अन्‍तरराष्ट्रीयसंबंध हैं, लेकिन भारत के अन्‍तर्राष्‍ट्रीयमामलों का उससे कुछ लेना-देना नहींइसका अर्थ हुआ कि एक ही महाविद्यालय के विभिन्‍न विद्यार्थियों के बीच होने वाली प्रतियोगिता अन्‍तर्महाविद्यालयीन हुई जबकि अगर य‍ही प्रतिस्‍पर्धा एक से ज्‍यादा महाविद्यालयों के छात्रों के बीच हो तो अन्‍तरमहाविद्यालयीन कहलाएगी। अंतर्और अंतरके स्‍पष्‍ट ज्ञान से ही इन दोनों शब्‍दों के अन्‍तर को समझा जा सकता है।
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13. साधारण और सामान्य     

आम तौर पर 'सामान्य' और 'साधारण' का प्रयोग समानार्थी शब्दों के रूप में किया जाता है और एक लिहाज़ से ये दोनों समानार्थी हैं भी, लेकिन ये पर्यायवाची कतई नहीं हैं।

दोनों का ही अर्थ मामूली है लेकिन 'सामान्य' फिर भी निर्धारित औसत अपेक्षाओं को पूरा करता है जबकि 'साधारण' उस औसत से कुछ निचले दर्जे का, कुछ हल्कापन लिए होता है और उसमें औरों की अपेक्षा कोई विशेषता नहीं होती। जैसे, मोहन की शादी का निमंत्रण पत्र राम को सामान्य लगा लेकिन राधा को साधारण . 'सामान्य' अंग्रेजी का general/normal है और 'साधारण' ordinary.

इसी तर्क से general knowledge को सामान्य ज्ञान कहा जाता है, साधारण ज्ञान नहीं। एक अन्य उदाहरण देखिए, साधारण-सी (ordinary) बात पर लोग मरने-मारने को उतारू हो गए लेकिन पुलिस के हस्तक्षेप से हालात जल्द ही सामान्य (normal) भी हो गए।

दोनों शब्दों का असली भेद उनके आगे निषेधात्मक '' जोड़ने पर समझ आता है यानी जो साधारण नहीं है वह असाधारण है, एक्स्ट्राऑर्डिनरी है लेकिन जो सामान्य नहीं है वह असामान्य यानी एब्नार्मल है। अब इन शब्दों को देख कर पता चलता है कि यह दोनों शब्द एक- दूसरे के पर्यायवाची कभी नहीं हो सकते।
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14. पुरातन और सनातन  

दोनों ही शब्‍द पुराने के अर्थ में प्रयुक्‍त होते हैं। ज़रा सा फर्क यह है कि पुरातन अगर बहुत पुराना है तो सनातन इतना पुराना है कि उसकी शुरुआत कब हुई, यह भी ज्ञात नहीं है। वह अनादिकाल से चला आ रहा है और शाश्‍वत है, नि‍त्‍य है, बदलने वाला नहीं है लेकिन पुरातन का आदि ज्ञात है। जैसे पुरातनपंथी और सनातन धर्म। हिंदू धर्म को सनातन इसीलिए कहा जाता है। यह कोई पंथ नहीं जिसका कि संस्‍थापक और संस्‍थापना समय ज्ञात हो, यह अनादिकाल से समाज में प्रतिष्ठित है। वहीं पुरानी परंपराओं/मान्‍यताओं के प्रति अति अनुराग रखने वाले को आप सनातन पंथी नहीं पुरातनपंथी कहेंगे।

दरअसल, सनातन सनात्से बना है जो कि संस्‍कृत का एक अव्‍यय है और जिसका अर्थ ही है, हमेशा/सर्वदा। इस प्रकार पुरातन और सनातन में वही फर्क है जो अंग्रेज़ी के old, ancient और eternal, perpetual में है। सृष्टि की रचना, पालन और संहार करने वाले ब्रह्मा, विष्‍णु और शिव का एक नाम इसीलिए सनातन है।

पुनश्‍च: दोनों शब्‍दों के अर्थ को समझते हुए यह जानना भी दिलचस्‍प होगा कि धरती का पालन करने वाले विष्‍णु भगवान को सनातन पुरुष और पुरातन पुरुष भी कहा जाता है और इसी पर रहीम जी का दोहा देखिए: कमला थिर न रहीम कहि, यह जानत सब कोय। पुरुष पुरातन की बधू, क्‍यों न चंचला होय।। यहां पुरातन पुरुष का अर्थ बूढ़े विष्‍णु है।
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15. भ्रम और संदेह 

आम तौर पर भ्रम और संदेह को समानार्थी मान लिया जाता है पर ऐसा नहीं है। ये दोनों ही शब्‍द किसी न किसी प्रकार के संशय की स्थिति में ज़रूर प्रयुक्‍त होते हैं पर दोनों में निश्चितता और अनिश्चितता का फर्क है।

भ्रम का अर्थ है कुछ का कुछ समझ लेना जबकि संदेह में ऊहापोह, उलझन की स्थिति होती है

उदाहरण के लिए छोटा बच्चा जब शाम को सो कर उठा तो उसे भ्रम हुआ कि सुबह हो गई या फिर कागज़ के फूल देखकर भँवरे को असली फूलों का भ्रम हुआ और वह उन पर जाकर बैठ गया। यानी  भ्रम में पूरे विश्वास और निश्चय के साथ हम कुछ का कुछ समझ लेते हैं।

अब संदेह का उदाहरण देखें; मुझे संदेह है कि उसकी दुकान अच्छी चल रही होगी या फिर ऑफिस से निकलने में देर हो गई है, मुझे संदेह है कि हम समय पर पार्टी में पहुंच पाएंगे। इन दोनों ही उदाहरणों में अनिश्चय की स्थिति है, यह विश्वास नहीं है कि जो हम सोच रहे हैं वह ठीक है या नहीं। इस प्रकार भ्रम का अर्थ है, पूरे विश्‍वास के साथ कुछ का कुछ समझ लेना जबकि संदेह का आशय है, किसी प्रकार के अनि‍श्‍चय में होना।

#हिन्‍दी_पढ़ेगा_इण्डिया_तो_आगे_बढ़ेगा_इण्डिया