Monday, 11 January 2016

It takes two to tango

Delhi government’s odd-even traffic policy aimed at putting check on rising levels of air pollution in the city has been fetching mixed bag of reactions since its very inception. Some people are finding it an impractical and unsustainable idea which would only cause inconvenience to common people whereas there is a sizeable segment of society which is taking it as a tiny but potential step towards creating better environment. Now as a week has been over since the roll out of the scheme, it seems to see some daylight.

As a common Delhiite my first observation is not about air quality but the roads. Free from the maddening crowd of vehicles they seem to have heaved a sigh of relief, especially during the peak office hours. Driving to workplace is a hectic experience in Delhi with honking horns creating din in ears, two-wheelers making their way through the narrow passages between road biggies, by lanes occupied by scooters, motorbikes, and even cars giving no space to cycle riders whom they actually are meant for. For pedestrians, crossing a road at busy hours means waiting for long before the rushing cars and bikes give them way but since the onset of New Year the scenario looks somewhat changed. With less traffic on the roads, you are less vulnerable to traffic jams and hope to ride with little more dignity on roads. Reduction in commuting time and parking convenience are added benefits.

But like anything else this policy has its own odds. We cannot undermine the fact that mobility is something very essential to growth, be it an individual or a geographical unit but at the same time it necessarily doesn’t come by using private vehicles. This mobility can also be achieved through self-sufficient and efficient public transport system. The government is trying to even out the odds in this regard by promoting car pooling, making thousands of extra buses ply on the roads and more frequent and better metro services but still daily commuters are experiencing some practical problems, say, metro stations being very far from their houses, auto rickshaws overcharging and refusing to go to any place not of their choice etc. No doubt efforts by the government need to be taken to a level where people start enjoying hassle free public transport instead of tedious driving to their destination but this cannot happen overnight.

One more reason of fretting is government’s decision of keeping two-wheelers, women drivers, VIPs etc. outside the ambit of the policy. Yes, it is a valid point which has also been questioned by the High Court of Delhi. Experts tell two-wheelers come second in polluting air only after trucks. Out of 89 lakh registered vehicles in Delhi 45 lakh are reported to be two-wheelers. But the government plans not to give such exemptions to two-wheelers and women drivers in next phase of the scheme. One more logic put forward by those against the policy is that construction dust, agricultural waste burning, illegal mining etc. also prove hazardous to environment, then why should the sword dangle only over the automobiles? Right. Let us see if the government. implements cleaning by vacuum cleaners from April 1, 2016 as announced by It. It may give respite from dust problem but we should remember that the experts have suggested that vehicular emissions prove more noxious than construction dust as they affect the people commuting on roads as well those who reside close to main roads.

Not going into the politics of the issue, Let us wake up and smell the coffee. Delhihas become world’s most polluted city. Tests conducted by city doctors reveal that one out of four Delhiites is suffering with bad lung health. Even young school going children are facing respiratory problems and nebulizing. Health researchers have come up with the studies which suggest that microscopic particles present in diesel are carcinogens and reactive gases like carbon monoxide, nitrogen oxide etc. emitted by vehicles damage human cells and lead them to inflammation of respiratory system which results in various respiratory diseases.

Let us come out of our respective comfort zones and cooperate the government in implementing the scheme as it takes two to tango. I appeal not to resort to using fake number plates, buying two-wheelers, looking for exemptions. Let time tell whether this policy will work or not but please give it a chance for the sake of our future. Let us set an example for others to follow. Let us espouse it, at least for sometime in an effort to give our next generation a cleaner and clearer air to breathe. As Alexander Lowen once said:

“We live in an ocean of air like fish in a body of water. By our breathing we are attuned to our atmosphere. If we inhibit our breathing we isolate ourselves from the medium in which we exist. In all Oriental and mystic philosophies, the breath holds the secret to the highest bliss.”

Friday, 18 September 2015

‘हिंदी वाली’ होने का दर्द

‘‘आज तुम हिंदी वालों का कोई प्रोग्राम है क्‍या?!’’, ‘‘ये हिंदी वालों ने हिंदी में काम-वाम करने का क्‍या सर्कुलर निकाला है?’’,ये कुछ ऐसे जुमले हैं जिनसे एक सरकारी महारत्‍न कंपनी के राजभाषा विभाग में काम करने के नाते मुझे आए दिन दो-चार होना पड़ता है। जैसे ही किसी के मुंह से तुम हिंदी वाले सुनती हूं, सबसे पहले मेरा दिमाग ये सोचकर घूम जाता है कि जिन महाशय या महाशया से मैं बात कर रही हूं, वे क्‍या किसी और देश से इम्‍पोर्ट हुए हैं (जैसा कि हिंदी भारत संघ की राजभाषा है) मगर अफ़सोस मैं जानती हूं कि ऐसा नहीं है-कोई भरतपुर से है तो कोई भटिंडा से, कोई दादरी से है तो कोई दरभंगा से।

यहां यह तर्क दिया जा सकता है कि मैं हिंदी वाले को गलत संदर्भ में समझ रही हूं, इसहिंदी में विभाग शब्‍द समाया है यानी इसका मतलब हुआ हिंदी विभाग वाले। जी हां,सहज बुद्धि तो यही कहती है पर अंग्रेज़ी में एक कहावत है न, ‘Face is the index of mind’, बस वही बात है। हिंदी के प्रति हीनता के जो भाव ऐसे अनेक (सब नहीं) सहकर्मियों के चेहरे से झलकते हैं, वही हिंदी वाले की व्‍याख्‍या को व्‍यापक बनाते हुए इसमें छिपे तंज की ओर इशारा करते हैं और यह बोलने वालों की खुद को हिंदी से अलग करने की हड़बड़ी को भी जताते हैं।

सवाल ये है कि जब हम हिंदी में बातचीत करते हैं, हिंदी फ़ि‍ल्‍में देखते हैंहिंदी गीत गुनगुनाते हैंहिंदी के अख़बार पढ़ते हैं, हिंदी में गप्‍प मारते हैं यानी अपनी निजी ज़ि‍न्‍दगी में नितांत हिंदीमय हैं तो फिर औपचारिक माहौल में अचानक अपने ऊपर अंग्रेज़ी का मुलम्‍मा कैसे और भला क्‍यों चढ़ा लेते हैं?

बीबीसी के अनुसार मैंडरिन, स्‍पेनिश, अंग्रेज़ी आदि के बाद हिंदी दुनिया में पांचवीं सबसे ज्‍यादा बोली जाने वाली भाषा है...क्‍योंअंग्रेज़ी अधिक बोली जाती है क्‍योंकि अंग्रेज़ी साम्राज्‍य सबसे बड़ा था और वह विभिन्‍न भाषाभाषियों के बीच संपर्क भाषा (lingua franca) का काम करती है, मैंडरिन जनसंख्‍या के लिहाज़ से सबसे बड़े देश चीन की भाषा होने के कारण खूब बोली जाती है, पर हिंदी अपनी वैज्ञानिकता और गुणग्राह्यता के लिए दुनियाभर में सम्‍मान पाती है। हिंदी ने जितने विदेशी शब्‍दों को जस-का-तस अपनाया है, उतना शायद ही किसी भाषा ने अपनाया हो। कागज़, बाज़ार, सज़ा, बर्फ़ (अरबी-फारसी), डायरी, टिकट,इंजन (अंग्रेज़ी), साबुन, संतरा, बाल्‍टी (पुर्तगाली), रिक्‍शा (जापानी), काजू (फ्रांसीसी), चाय, लीची (चीनी) जैसे शब्‍द हिंदी के संपर्क में आए और उसमें ऐसे जज़्ब हो गए कि अब हमारे लिए इन शब्‍दों के बिना हिंदी की कल्‍पना करना भी संभव नहीं। ज़रा बताएं कि जब आप चाकू बोलते हैं तो क्‍या आपको महसूस होता है कि आप कोई विदेशी शब्‍द बोल रहे हैं जबकि यह एक तुर्की शब्‍द है।

विदेशी जिस भाषा को सीखने में इतनी दिलचस्‍पी दिखाते हैं, जो भाषा विज्ञान और टेक्‍नोलॉजी के लिहाज़ से सबसे सक्षम मानी जाती है, आखिर हम भारतीय ही अपनी उस हिंदी को आत्‍महीनता से जोड़कर क्‍यों देखते हैं? यह हमारी अपरिपक्‍वता ही है कि हम अंग्रेज़ी ज्ञान को प्रतिभा से जोड़कर देखते हैं जबकि भाषा ज्ञान प्रतिभा नहीं जानकारी से जुड़ी चीज़ है।

हिंदी को हीन मानने की यह बीमारी संक्रामक है। घर में अगर बड़ों को लगी है तो बच्‍चों को तो सौ प्रतिशत अपनी गिरफ़्त में लेकर ही छोड़ती हैआखिर बच्‍चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम जो होती है। इस बीमारी की एक बानगी ये कि मेरे अधिकतर रिश्‍तेदारों के बच्‍चे प्राइवेट अंग्रेज़ी स्‍कूलों में पढ़ते हैं जिनमें से अधिकतर अपना सबसे पसंदीदा विषय अंग्रेज़ी और हिंदी को सबसे बोरिंग और बेकार विषय बताते हैं। यहां तक तो समझ आता है पर मैं चक्‍कर में तब पड़ जाती हूं जब वो अपने बेस्‍टेस्‍ट फ्रेंड के बारे में हिंदी में बखूबी बताते हैं। मतलब भाषा के मामले में भारतीय बच्‍चों की एक बड़ी जमात अपने स्‍कूली दिनों से ही दिग्भम्रित रहती है। फिर आगे उनसे अपनी भाषा से प्‍यार करने की उम्‍मीद कैसे पाली जाए?यहां सोचने वाली बात यह है कि क्‍या बेस्‍टेस्‍ट फ्रेंड के बारे में बताने वाले ये बच्‍चे अपना पाठ्यक्रम अंग्रेज़ी में समझ पाते होंगे यानी भाषा के साथ-साथ विषय-ज्ञान का भी घोर संकट!!! कहने की बात नहीं जहां नींव ही गलत पड़ी हो वहां इमारत के ध्‍वस्‍त होने के प्रति तो आश्‍वस्‍त रहा ही जा सकता है। 

लॉर्ड मैकाले ने एक दफ़ा कहा था, ''मैंने भारत के कोने-कोने में भ्रमण किया है। यहां मैंने ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं देखा जो किसी से भी कमतर पड़ता है। इस देश में मैंने इस तरह की समृद्धता, शिष्टता और लोगों में इतनी अधिक संभावना देखी है और मैं यह सोच भी नहीं सकता कि हम यहां राज कर पाएंगे जब तक कि इनकी रीढ़ की हड्डी को ही न तोड़ दें जो कि इस देश के अध्यात्म और संस्कृति में निहित है। अतः मैं प्रस्ताव रखता हूँ कि हम यहां के पुरातन शिक्षातंत्र और संस्कृति को ही बदल दें। यदि ये भारतीय सोचने लगे कि विदेशी और अंग्रेजी ही श्रेष्ठ है और हमारी संस्कृति से उच्चतर है तो वे अपना अत्मसम्मान, अपनी पहचान तथा अपनी संस्कृति को ही खो देंगे। और तब वे वह बन जाएंगे जो उन्हें वास्तविकता में बनाना चाहते हैं। सही अथों में एक गुलाम देश।'' यह हमारा दुर्भाग्‍य ही है कि उपरोक्‍त विचारों वाले और भारत में अंग्रेज़ी माध्‍यम की शिक्षण प्रणाली की शुरुआत करने वाले मैकाले की उसी शिक्षण व्‍यवस्‍था को हम आज तक खुशी-खुशी और सगर्व ढो रहे हैं। 

अगर आप हिंदी के ऊपर अपनी क्षेत्रीय भाषा को रखते हैं और गुजराती, मराठी या बंगाली में बोलना-लिखना पसंद करते हैं तो वो और बात है। तब आप भारतीय संस्‍कृति और भारतीयता की जड़ों को खाद-पानी ही देते हैं। और हां, अगर आप अंग्रेज़ी सीखते हैं और उसमें बोलते-लिखते हैं, तो भी कोई बुराई नहीं क्‍योंकि ज्ञान कैसा भी क्‍यों न हो, हमेशा मनुष्‍य को बेहतर ही बनाता है पर हिंदी को अंग्रेज़ी से कमतर मानना क्‍या हमारी आत्‍महीनता का परिचायक नहीं? क्‍या हम अंग्रेज़ों के वर्चस्‍व से आज़ाद होने के लिए खुद को तैयार ही नहीं कर पा रहे?

आखिर में अक़बर-बीरबल का एक रोचक किस्‍सा...एक बार अक़बर के दरबार में एक विद्वान् आया जिसे सैंकड़ों भाषाएं न सिर्फ़ आती थीं, बल्कि वो उनमें इतना पारंग‍त था कि उसकी मातृभाषा पहचानना तक मुश्किल था। उसने दरबारियों को चुनौती दी कि कोई उसकी मातृभाषा पहचानकर दिखाए। सभी दरबारी बगलें झांकने लगे। यहां तक कि अपनी प्रत्‍युत्‍पन्‍न‍मति (presence of mind) और हाज़ि‍रजवाबी के लिए मशहूर बीरबल भी चित्त। आखिर बीरबल ने कहा कि महामनाहम सब आपके भाषा-ज्ञान के प्रति नतमस्‍तक हैं। हमने आपका लोहा मान लिया। भाषाविद् गर्व भरी मुस्‍कान के साथ अभी अक़बर की ओर पलटा ही था कि बीरबल ने उसे टांग मार दी, वह हकबकाकर गिर पड़ा और गुस्‍से में कुछ-कुछ बड़बड़ाने लगा। बीरबल ने कहा, महोदय, मैं यह तो नहीं जानता कि आप किस भाषा में और क्‍या बोल रहे हैं पर इतना निश्चित रूप से कह सकता हूं कि यही है आपकी मातृभाषा

साफ़ है...हमारी तत्‍काल प्रतिक्रिया (instant reaction) हमारी अपनी भाषा में ही होती है।आप-हम न जाने कितने ही झगड़ों के चश्‍मदीद रहे होंगे...झगड़े भले ही अंग्रेज़ी के किसी अशोभनीय और तिरस्‍कारपूर्ण शब्‍द से शुरू होते हों लेकिन खिलाड़ी ज़्यादा देर तक अंग्रेज़ी पिच पर नहीं टिक पाते। रगों में जोश-ओ-जुनून का दौरा बढ़ते ही सब हिंदी में वाक् युद्ध पर उतर आते हैं। बड़ी-बड़ी मीटिंग्‍स में भारी-भारी पदनामों वाले भी हिंदी या हिंग्लिश बोल रहे होते हैं। हाई-प्रोफ़ाइल अफ़सर भी इनफॉर्मल होते ही हिंदी में चुटकियां लेने लगते हैं।

कुल मिलाकर मतलब यही कि अधिकांश मामलों में हम चाहकर भी हिंदी में बात करने से कतराते हैं और भाषा को लेकर हमारी यही अप्रोच मुझे ज़रा कम समझ आती है। हम भारतीय हिंदी को फोल्डिंग पलंग की तरह इस्‍तेमाल करते हैं, अनौप‍चारिक माहौल मिलते ही बिछाकर पसर गए और औपचारिक लोगों के सामने पड़ते ही समेटकर कोने लगा दिया और सूट-बूट वाले बाबू साहब बन गए।

खैर, दिन तो सभी के फिरते हैं। खुशी की बात है कि हिंदी के भी फिरते नज़र आने लगे हैं। मोदी जी के आने से कम-से-कम सरकारी महकमों में तो हिंदी में कामकाज बढ़ने लगा है। आला अफ़सर हिंदी में भाषण और प्रजेंटेशन देने की मशक्‍कत करते नज़र आने लगे हैं पर इंतज़ार है तो उस दिन का जब हम हिंदी के प्रति अपना रवैया और सोच बदलेंगे और गुरुवर रवीन्द्रनाथ टैगोर (बांग्‍लाभाषी) की मनोकामना के अनुसार भारत की सब प्रांतीय बोलियांजिनमें सुंदर साहित्‍य की रचना हुई हैअपने-अपने प्रांत में रानी बन कर रहेंगी और आधुनिक भाषाओं के हार की मध्‍यमणि हिंदी भारत भारती होकर विराजेगी।

Friday, 17 April 2015

समीक्षा : छुटपन के दिन (बाल कहानी संग्रह) लेखक - तुषार उप्रेती


बच्‍चों के लिए लिखना बच्‍चों का खेल नहीं। बड़ों के लिए लिखते समय लेखक जैसी चाहे वैसी भूमिका अपना सकता है; प्रेरक, मार्गदर्शक, दोस्‍त, उपदेशक और यहां तक कि तटस्‍थ रचनाकार की भी। लेकिन अगर आप बच्‍चों के लिए इस उद्देश्‍य के साथ कुछ लिखना चाहते हैं कि वो उनके जीवन में सार्थक बदलाव लाए, उनके व्‍यक्तित्‍व और चरित्र को तराशे तो आपको एक माँ की मानिंद पहले उनकी मनोभूमि में प्रवेश करना होगा, फिर खुद भी एक बच्‍चा बनकर उनसे दोस्‍ती गांठनी होगी, तभी आप अपनी कह पाएंगे और वे सुन पाएंगे।

लेखक तुषार उप्रेती ने अपने प्रथम बाल कहानी संग्रह छुटपन के दिन में भाषा, विषय, पात्र सभी स्‍तरों पर बच्‍चों की दुनिया में जाकर उनसे संवाद स्‍थापित करने का कुछ ऐसा ही सफल प्रयास किया है। पांच से दस वर्ष तक के बच्‍चों को लक्षित करके लिखे गए इस संग्रह में कुल पांच कहानियां हैं जिनमें बच्‍चों को साफ-सफाई, पोषक खान-पान, सामान्‍य ज्ञान, पर्यावरण जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों के बारे में बताया गया है। पूरी किताब का उद्देश्‍य बच्‍चों में अच्‍छी आदतों का विकास करना है, लेकिन अच्‍छी बात यह है कि ऐसा मनोरंजक मिसालें देकर किया गया है, कोरी समझाइश से नहीं।

कहानियां चाहे बच्‍चों के लिए हों या वयस्‍कों के लिए, जिज्ञासा हमेशा उनका प्राणतत्त्व रहा है। आखिर, वही पाठक को बांधती है, इस कसौटी पर भी इस कहानी संग्रह की कथाएं खरी उतरती हैं। आकर्षक चित्रों से युक्‍त सभी कहानियां विभिन्‍न पात्रों के बीच संवादों के सहारे शक्‍ल लेती हैं और एक मुकम्‍मल अंत की ओर बढ़ती हैं। इन कहानियों की एक खास बात यह भी है कि इन्‍हें पढ़ने के साथ-साथ कहने-सुनाने की शैली में लिखा गया है। अगर आप हाथ में किताब लेकर भी किसी कहानी का पाठ कर जाएं तो बच्‍चे भाषा की जटिलता के कारण भावार्थ ग्रहण करने में कहीं अटकेंगे नहीं। विभिन्‍न कार्यशालाओं में इसे आज़माया भी जा चुका है। आखिर हमारे देश में श्रुतियों की परंपरा रही है जहां सिर्फ वाचन-श्रवण के माध्‍यम से ही महान् ज्ञान को आत्‍मसात् किया जाता रहा है।  

अंत में, यह किताब उन सभी दादी-नानी, माता-पिता, शिक्षक-मार्गदर्शकों के लिए एक अनमोल खज़ाना साबित हो सकती है जो बच्‍चों को पंचतंत्र, हितोपदेश की कहानियां सुना-सुनाकर उनमें रोज़ कहानी सुनने की आदत डाल चुके हैं पर अब जिनका स्‍टॉक खत्‍म होने के कगार पर है। और हाँ, यह खास तौर पर आपको आज के परिप्रेक्ष्‍य में बच्‍चों से संबंधित समस्‍याओं के निवारण का एक रचनात्‍मक रास्‍ता भी सुझाएंगी।     

Friday, 30 January 2015

जाड़ों की धूप


जाड़ों की सर्द सुबह को
आसमान की गोद में दुबके सूरज ने
सरकाकर जब बादलों की रज़ाई
धरती पर डाली एक नज़र अलसाई     

तब चाहरदीवारी के गुलमोहर से छनकर
आंगन में उतर आई कुनकुनी धूप

निपटाकर झटपट चूल्‍हा-चौका  
गृह बनिताओं ने जमाया आंगन में डेरा
कोई फैलाती दालान में पापड़-बड़ि‍यां
कोई लिए बैठी है पालक-मेथी-बथुआ

एक नवोढ़ा गुनगुना रही है अस्‍फुट-सा कोई गीत   
अहाते में अचार-मुरब्‍बों को दिखाती हुई धूप

अम्‍मा की तो लग गई लॉटरी 
सिकुड़ी बैठी थी लिहाफ़ में बनकर गठरी
अब धूप में बैठ पहले चुटिया गुंथवाएंगी
फिर मुनिया के अधूरे स्‍वेटर के फंदे चढ़ाएंगी  

खिल उठता अम्‍मा का ठण्‍ड से ज़र्द चेहरा   
जब-जब अपनी जादुई छड़ी घुमाती धूप  

             बूढ़े माली काका में भी आई कैसी गज़ब की फुर्ती                               
अब बस उनका बगीचा, खाद-बीज और खुरपी
पानी का पाइप जो था लॉन की छाती पर सुस्‍त पड़ा
मोटी-मोटी जलधाराओं से धो रहा है पत्तों का मुखड़ा
                        
कुम्‍हलाए फूल भी जैसे फिर जी उठते
जब उनकी पंखुड़ि‍यों को सहलाती धूप 

बिल्‍लू-बंटी-बब्‍ली को तो देखो क्‍या मस्‍ती छाई है
फेंककर एक तरफ टोपी-मफलर छत की दौड़ लगाई है
टेरिस के एक कोने में रखी पतंग और डोर
पड़े-पड़े हो रही थीं न जाने कब से बोर

लगा रहेगा आसमान में रंग-बिरंगी पतंगों का मेला
      जब तक छत पर तिरपाल बिछाए रहेगी धूप            

होने लगा सांझ का झुटपुटा
आंगन भी लगने लगा बुझा-बुझा   
पापड़-बड़ि‍यां और अचार-मुरब्‍बे
सब-के-सब घर के भीतर खिसके   

इधर उतर रही अम्‍बर से संध्‍या-सुंदरी
उधर नीम-अंधेरे में गड्डमड्ड हो रही धूप    

रसोई में पक रही है ताज़ा मेथी
अम्‍मा बैठी मंदिर में बांच रही है अपनी पोथी
खेलकूद के बाद अब बच्‍चे भी कर रहे हैं पढ़ाई
खत्‍म हुई हरी-पीली पतंगों की लड़ाई   

जड़-चेतन के जीवन को कर यूं स्‍पंदित
समा गई सूरज की बांहों में थकी-थकी सी धूप 

Thursday, 15 January 2015

On Sundays
















It is Sunday tomorrow
he plans to sleep till late in the morning
there is just one day for rest
‘don’t disturb’; children are already given the warning 

She too is feeling a little relaxed
as there will be no office hurry
cupboards are stacked with dirty clothes
so, she plans to do the laundry

He takes pleasure
in having bed tea with newspaper
news, articles and feature
replete with all information and knowledge treasure  

She will clean the house
and remove all the clutter
it is her resolve on holidays
to make the house tidy and better

He is planning to have sunbath this Sunday
the sun is shining pleasantly bright
eating groundnuts soaking in the sun
what a delight! what a delight! 

The sun goes down the horizon
by the time she is free
She forgets her body need of Vitamin D
in her cleaning and washing spree

He is planning to watch the new film
brought last night
made by his favorite director on his favorite subject
Indian society and women’s plight

It is a holiday   
so children have refused to eat chapatti and curry
she is already in the kitchen
cooking veg. manchurian with gravy
  
Her hands are busy chopping onions
When the little baby does poo
he screams seated on the sofa
oh dear! please see, where are you?

She cleans the shit and makes fried rice
everybody licks the fingers
saying the whole meal is perfect
tasty, wonderful, very nice

She thinks of asking him to make her a cup of tea
much needed in winters to work and survive
but he is dressed up
all set to go on a long drive 

He comes late in the night
full of excitement
shows her the photos clicked
and slips in the blanket

After a long hectic day
she plans to read something at night
but he is extremely tired and wants to sleep
so she silently switches off the light 

Monday, 8 December 2014

कहाँ गया ओ! बचपन मेरे




  
कहां गया ओ! बचपन मेरे
लेकर मस्‍ती भरे दिन सुनहरे

 झरते ही दो आँसू आँखों से माँ दौड़ी चली आती थी
पहले भरती आलिंगन में फिर अमृत जैसा दूध पिलाती थी 
पाकर ममता की मधुर खुराक 
देह ही नहीं आत्‍मा भी तृप्‍त हो जाती थी

लौटा दे मुझे वो ममताभरा आँचल
सुरभि माँ के शरीर की   
जब से छूटी उसकी देहरी
हुई मैं तो अनाथ-सी

किसे कब क्‍या चाहिए
बिन कहे पापा न जाने कैसे जान जाते थे
पंचतंत्र-हितोपदेश की कहानियों के बहाने
जीवन के नित नए पाठ पढ़ाते थे

एक मौका दे-दे फिर से
उनसे गुड़ि‍या की ज़ि‍द्द करने का
थामकर उनकी अंगुली
जीवन की फिसलनभरी राहों पर संभलने का

दिन-रात सताने-रुलाने वाली बहना 
परीक्षा के दिनों में हर विध साथ निभाती थी
बोल-बोलकर याद कराती हर सबक 
खुद ही किताब बन सामने खुल जाती थी

मुझे फिर उसके पीछे बैठ साइकिल पे
बर्फ का गोला खाने जाना है
पहले जमकर लड़ना फिर सिरदर्द होने पर
कनपटियों पर उसका स्‍नेहिल स्‍पर्श पाना है

छूट गए वो संगी-साथी
जिनके साथ अजब-अनोखी यारी थी
जिस सखी से लड़ बैठे सुबह-सवेरे
शाम उसी के साथ खेलते हुए गुज़ारी थी

मुझे फिर पहन के पापा की ऐनक
टीचर-टीचर का खेल रचाना है
बांधकर माँ की साड़ी
मेहमानों को 'रसना' पिलाना है

रूठ न मुझसे प्‍यारे बचपन
ले स्‍वागत में तेरे मैंने बाँहें फैलाईं
अरे! ये देखो तूफान-मेल सी दौड़ती
मेरी नन्‍हीं परी उनमें आ समाई

चल माँ, हम दोनों पकड़म-पकड़ाई खेलते हैं
मेरे सारे दोस्‍त हैं गंदे, मुझसे नहीं बोलते हैं 
रात तू मुझको झांसी की रानी की कहानी सुनाना
कल की तरह फिर अपने वादे से मुकर न जाना 

 साथ बिटिया के खेलते-कूदते 

मैंने वो निर्मल शांति पाई
बरसने लगा नेह का निर्झर
मन की कुटिया में फिर हरियाली छाई

धुल गए अवसाद के सब क्षण 
जीवन में नवल उत्‍साह छाया
पंथ निहारती रही जिसका बरसों 
वो बचपन बिटिया के रूप में फिर लौटकर आया


Friday, 31 October 2014

आज मैं ऑफिस नहीं जाऊंगी

ढल रही शनिवार की शाम    
कल है इतवार
एक दिन की ऑफिस की छुट्टी में 
कर डालूंगी अपनी लाडो को हफ्तेभर का प्‍यार

सुबह-सुबह जब वो नींदों में लेटी-लेटी कुनमुनाएगी
और लोटपोट होती बिस्‍तर पर मुझे टटोले जाएगी
चिपकाकर छाती से उसको पहले माथा सहलाऊंगी
फिर हौले-हौले देकर थपकियां मन-ही-मन गुनगुनाऊंगी
सो जा रानी, सो जा, आज मैं ऑफिस नहीं जाऊंगी 

अलसाई आंखों को मलती जब वो मम्‍मा आवाज़ लगाएगी
छोड़कर सब चूल्‍हा-चौका कमरे की दौड़ लगाऊंगी
लेकर बलैयां उसके बिखरे बालों की  
बांहों के झूले झुलाऊंगी
जीभर के सुस्‍ता ले रानी, आज मैं ऑफिस नहीं जाऊंगी  

डालकर काजू, किशमिश, केसर आज लाडो के लिए खीर बनाऊंगी
जो न भाई खस्‍ता पूड़ी, फटाफट गरम परांठा सेंककर लाऊंगी
इडली, आमलेट, पुलाव-सब होंगे एक इशारे पर हाज़ि‍र
खिलाकर एक-एक निवाला उसे अपने हाथों से, मैं भी तृप्‍त हो जाऊंगी
कर ले रानी जीभर कर नखरे, आज मैं ऑफिस नहीं जाऊंगी

कल लाई जो बाज़ार से नया, उस स्विमिंग पूल में नहलाऊंगी
पहले भरूंगी पूल को रंग-बिरंगी गेंदों से फिर लाडो को उसमें बैठाऊंगी  
जब वो मस्‍ती में आकर करेगी छप-छप
और अपनी नन्‍ही अंजुरि में भर-भरकर पानी मुझे भिगोएगी
खूब खेलूंगी लाडो के साथ बेमौसम होली, आज मैं ऑफिस नहीं जाऊंगी

लो हो गई शाम, लाडो मचल रही है बाहर जाने को
नज़र न लग जाए कहीं किसी की, सबसे पहले काला टीका लगाऊंगी
फिर पैरों में डालकर क्रॉक्‍स, बालों में मैचिंग क्लिप्‍स सजाऊंगी
जब खेलेंगे हम पकड़म-पकड़ाई उसके साथ मैं भी बच्‍ची बन जाऊंगी
घर लौटकर सबसे पहले उसके नन्‍हे पैर दबाऊंगी, आज मैं ऑफिस नहीं जाऊंगी

पर ज्‍यों-ज्‍यों घिरेगा अंधेरा, मन-ही-मन कच्‍ची पड़ती जाऊंगी
कल फिर जाना है ऑफिस, यह सोच-सोच घबराऊंगी  
लाडो को तो बहला लेंगे सब मिलकर पर मुझे कौन समझाएगा  
मेरे मन में उमड़ते-घुमड़ते भावों की थाह भला कौन पाएगा 
सबके लिए तो ढलेगा सूरज पर मेरा तो सुख अस्‍ताचल जाएगा  

न कुछ कर सकी तो रात के लंबी होने की दुआ मनाऊंगी
रातभर चिपटाए रखूंगी उसे कलेजे से
पर उगते ही सूरज फिर घड़ी की सुइयों का हुक्‍म बजाऊंगी 
सोती हुई लाडो की नन्‍हीं हथेली के नीचे रखकर तकिया  
बुझे मन और भारी कदमों से एक बार फिर ऑफिस चली जाऊंगी  

Friday, 17 October 2014

नया सवेरा

वेक अप! वेक अप! दिस इज़ ए ब्रेण्‍ड न्‍यू मॉर्निंग’, मानसी ने लेटे-लेटे ही तकिए के नीचे से मोबाइल निकालकर अलार्म बंद कर दिया। कुछ समय पहले की बात होती तो इस अलार्म टोन से वह कुढ़ जाती...ब्रेण्‍ड न्‍यू मॉर्निंग...हुंह! काहे की न्‍यू मॉर्निंग। रोज़ एक ही तरह से तो बीतता है उसका दिन-वही चूल्‍हा-चक्‍की, वही घर-गृहस्‍थी। कहां कुछ नया है? पर आज उसके होंठों पर मंद मुस्‍कान खेल रही थी। जब से उसने नया स्‍मार्टफोन लिया था, उसके तो सुबह से लेकर शाम तक-मानो सब बदल गए थे।

उठने लगी तो देखा कि व्‍हाट्सएप पर कविता का संदेश आया हुआ था। खूब चटख रंग के फूलों से अत्‍यंत कलात्‍मक तरीके से स्‍क्रीन पर लिखा था, शुभ प्रात:, आपका दिन मंगलमय हो। उसका मन खुश हो गया। कविता उसकी स्‍कूल के दिनों की सहेली थी और कुछ महीने पहले ही फेसबुक के ज़रिए उन दोनों की करीब 15 साल बाद फिर से मुलाकात हुई थी। शुक्रिया, सुप्रभात का संदेश लिखकर गुनगुनाते हुए वह गुसलखाने की तरफ बढ़ी। फ्रेश होकर रसोईघर में आई तो सबसे पहले ईयरपीस कानों में लगाया और मोबाइल पर हरि ओम शरण के अपने पसंदीदा भजन लगा लिए। स्‍कूल के दिनों से ही मानसी की आदत सुबह उठते ही भजन सुनने की थी पर विवेक की अक्‍सर नाइट शिफ्ट होने के कारण उसने शादी के बाद से ऐसा करना छोड़ दिया था। म्‍यूजिक सिस्‍टम चलने पर विवेक की नींद में खलल पड़ता था पर अब एक छोटे से ईयरपीस ने उसकी समस्‍या हल कर दी थी।    

चूल्‍हे पर चाय का पानी चढ़ाकर वह नाश्‍ते के लिए सब्जियां काटने लगी। तीन दिन बाद विवेक  अपने जयपुर दौरे से लौट रहे थे और अब एक घंटे में उदयपुर पहुंचने ही वाले थे। विवेक को सब्जियों वाले पोहे पसंद हैं पर अक्‍सर वो आलू-प्‍याज़ डालकर ही इतिश्री कर लेती है। आज वो खूब सारी सब्जियां डालकर पोहे बनाएगी। उसके हाथ चॉपबोर्ड पर सब्जियां काटने में लगे थे पर मन पंख लगाकर अतीत की गलियों में जा पहुंचा था...शादी के समय वो एक निजी कॉलेज में व्‍याख्‍याता थी पर बेटी अवनि के होने के बाद उसे नौकरी छोड़नी पड़ी थी। विवेक का कहना था कि इस समय अवनि को मानसी की सबसे ज्‍यादा ज़रूरत है, नौकरी तो वो जब चाहे कर सकती है। वह शुरू से ही अपने करिअर को लेकर बहुत महत्‍वाकांक्षी रही थी पर विवेक की बात निराधार नहीं थी, इसलिए उसने भी नौकरी छोड़ने के लिए आसानी से सहमति दे दी थी।

जब तक अवनि स्‍कूल नहीं जाती थी, तब तक तो उसका दिन कैसे कट जाता, उसे खुद पता नहीं चलता था पर अब दो साल से अवनि स्‍कूल जाने लगी थी। वो घर में बैठी बोर होती पर अब भी अवनि इतनी बड़ी नहीं हुई थी कि वह उसे घर पर अकेला छोड़कर काम पर जा सके। वो छटपटाकर रह जाती। तड़के पांच उठना और घर के कामकाज में जुत जाना, यही उसका जीवन हो गया था।

सुबह साढ़े छह बजे अ‍वनि की स्‍कूल बस सोसाइटी के गेट पर पहुंच जाती है। उठते ही पहले उसका टिफिन बनाना, फिर पतिदेव को चाय पकड़ाकर बिटिया को जगाना और स्‍कूल के लिए तैयार करना। उस पर, अवनि को जगाना भी कोई कम आफत का काम थोड़े ही है। कितने भी लाड़ जताकर उठाओ, वो बार-बार कुनमुना कर सो जाती है। कभी-कभी तो उसे अवनि पर तरस आता है। इतने छोटे बच्‍चे का सुबह-सुबह स्‍कूल भागना...किसी सज़ा से कम है क्‍या? इतनी सुबह तो बिस्‍तर का मोह बड़े-बड़े भी मुश्किल से ही छोड़ पाते हैं।  

बहरहाल, यंत्रवत् यही सब करते-करते घड़ी की सुई कब 9 पर आ टिकती, उसे पता तक नहीं चलता। सुबह 9 बजे जब पतिदेव भी दफ्तर चले जाते तो वो तसल्‍ली से अपने लिए खूब खौलाकर अदरक-दालचीनी वाली चाय बनाती। उसके बाद घर-गृहस्‍थी के बाकी काम। करीब 12 बजे अवनि घर लौटती तो उसे खाना खिलाकर सुला देती और घंटा-दो घंटा टी.वी. देखकर खुदकर भी सो जाती। उठने के बाद फोन पर दोस्‍तों से गप्‍पबाज़ी और शाम होते ही फिर वही घर-गृहस्‍थी के पचड़े। दिन यूं ही कट रहे थे-बिल्‍कुल एक जैसे पर मानसी के मन का कहीं कोई कोना रीता ज़रूर था जिसका ठीक-ठीक आभास शायद खुद उसे भी नहीं था। इसलिए कुछ समय से उसके स्‍वभाव में चिड़चिड़ापन आ गया था...कितनी ही बार वह विवेक को तुनककर जवाब देती और अवनि को भी बात-बेबात फटकार देती।   

विवेक उसकी इस बैचेनी का कारण समझते थे। वे भी इस अपराधबोध से ग्रस्‍त रहते कि इतनी मेधावी होने के बावजूद मानसी ने उनकी घर-गृहस्‍थी संभालने के लिए अपने करिअर से समझौता किया। वो अक्‍सर मानसी से कहते, ‘‘कोशिश करो कि खाली समय में टी.वी. देखने या फोन पर बातें करने की बजाय कोई अच्‍छी किताब पढ़ो या संगीत सुनो।’’ इस पर मानसी और चिढ़ जाती, ‘‘दिनभर घर के काम में खटने के बाद थोड़ी देर टी.वी. देखना या सहेलियों से बात करना भी गुनाह है क्‍या?’’ विवेक चुप रह जाते। छुट्टी के दिन मानसी और अवनि को बाहर घुमाने ले जाकर, रेस्‍त्रां में खाना खिलाकर अपनी तरफ से कुछ भरपाई करने की कोशिश करते। एक-आध दिन तो मानसी खुश रहती पर फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाता।  

मानसी का जन्‍मदिन आने वाला था। ‘‘मानसी! इस बार जन्‍मदिन पर क्‍या तोहफा लेना चाहती हो’’? विवेक ने पूछा। ‘‘मेरे मोबाइल में कुछ दिनों से आवाज़ साफ नहीं आ रही। सोच रही हूं वही ले लूं।’’ ‘‘ठीक है, आज शाम तैयार रहना। हम तुम्‍हारा नया मोबाइल लेने चलेंगे।’’ दुकान पर वह विवेक से कहती रही कि उसे कोई सस्‍ता-सा मोबाइल दिला दे, उसे कौन-सा बाहर जाना है। घर पर ही तो रहना है पर विवेक उसे आधुनिक एंड्रॉयड मोबाइल दिलाकर ही माने। उनका तर्क था कि इस पर इंटरनेट और अनेक एप्लिकेशन्‍स होने से वह उसका कई तरीकों से इस्‍तेमाल कर सकेगी। लगे हाथ ही उन्‍होंने उसके मोबाइल में इंटरनेट कार्ड भी डलवा दिया और घर आते ही उस पर अनेक एप्लिकेशन्‍स डाउनलोड कर दीं। इसके बाद उन्‍होंने मानसी का फेसबुक अकाउंट बनाया और सर्च ऑप्‍शन में जाकर पहला नाम लिखा, कविता कुलश्रेष्ठ और ढेरों कविता कुलश्रेष्‍ठ मोबाइल स्‍क्रीन पर प्रकट हो गईं। अचानक तीसरे नंबर पर अपनी बचपन की सहेली की तस्‍वीर देखकर मानसी ठिठक गई। अरे! कितनी अलग लग रही है कविता’, कविता बदल ज़रूर गई थी पर उसका मस्‍तमौला अंदाज़ वही पुराना था जो तस्‍वीर में, स्‍केटिंग करते हुए भी उसके चेहरे पर साफ नज़र आ रहा था। विवेक ने मानसी की तरफ से लिखा, हैलो!’ और कविता को लॉग इन करना सिखाकर सोने चले गए। अगले दिन तड़के विवेक को तीन दिन के लिए लखनऊ दौरे पर निकलना था, इसलिए मानसी भी रसोईघर में जाकर सुबह की तैयारियों में लग गई। 

सुबह करीब पांच बजे विवेक स्‍टेशन के लिए रवाना हो गए। शनिवार होने के कारण अवनि की छुट्टी थी, इसलिए मानसी भी देर तक सोने के मूड में थी पर अचानक मोबाइल पर टन् न् न् की आवाज़ से चौंक गई। देखा तो फेसबुक पर कविता का मैसेज था, हाय!!!’ मानसी तो खुशी के मारे उछल ही पड़ी। एक बार फिर टन् न् न् की आवाज़ हुई और उसका दूसरा संदेश आया, मानसीSSSSSS कैसी है? कहां है आजकल?’ उसके बाद तो दोनों सहेलियों के बीच बातचीत का जो दौर शुरू हुआ, वो कविता के बच्‍चों के स्‍कूल जाने का समय हो जाने पर ही खत्‍म हुआ। अवनि अभी सोई हुई थी, इसलिए मानसी फोटो एल्‍बम में जाकर उसकी तस्‍वीरें देखने लगी। घूमने-फिरने के साथ-साथ ईनाम लेते हुए भी कविता की कई तस्‍वीरें एल्‍बम में लगी थी। मानसी को कुछ समझ नहीं आया। पिछले दो घंटों की बातचीत में उसने इतना तो जान लिया था कि कविता भी उसी की तरह उदयपुर में रह रही थी और एक गृहिणी थी। उसके पति एक सरकारी कंपनी में उच्‍च पद पर थे और इन दिनों जयपुर में पदस्‍थापित थे। बच्‍चों की पढ़ाई के कारण बाकी परिवार अभी उदयपुर में ही रह रहा था। 

अगले दिन कविता ने उसे अपने घर आने का न्‍यौता दिया था। मानसी सुबह से ही बहुत रोमांचित थी, सो जल्‍दी-जल्‍दी घर का काम निपटाकर कविता के बताए पते पर पहुंच गई। कविता के चेहरे पर वही चिर-परिचित मुस्‍कान थी। अवनि जल्‍द ही कविता के बच्‍चों के साथ घुल-मिल गई। ढेर सारी बातों के बीच मानसी ने कविता से ईनाम वाली तस्वीरों के बारे में पूछा। ‘‘अरे, वो तो मेरी वेबसाइट को सर्वश्रेष्‍ठ कुकरी वेबसाइट का पुरस्‍कार मिला था, उसकी हैं।’’ कविता की आंखों में अनोखी चमक थी। ‘‘पता है, दो महीने पहले ही मैंने एक अंतर्राज्‍यीय कुकिंग प्रतियोगिता जीती है जिसके पुरस्‍कार के रूप में अगले महीने मुझे संजीव कपूर के चैनल फूड-फूड में गेस्‍ट शेफ के तौर पर जाने का मौका मिल रहा है।’’ 

''ये देखो मेरी कुकरी वेबसाइट''
कविता अपनी ही रौ में बोली चली जा रही थी। ‘‘लेकिन तुझे यह वेबसाइट शुरू करने की सूझी कैसे?’’ ‘‘बस, बच्‍चों के स्‍कूल जाने के बाद घर में बैठी-बैठी बोर होती थी तो टाइम पास करने के लिए कोई न कोई व्‍यंजन बनाती रहती थी। एक दिन बेटी स्‍वाति ने अपने फेसबुक अकाउंट पर मेरे बनाए गोभी-मुसल्‍लम की फोटो खींचकर डाल दी। फोटो को जमकर लाइक मिले और उसके दोस्‍तों ने यमी’, देखते ही मुंह में पानी भर गया’, हमें कब खिला रही हो जैसे कमेंट्स लिखे। उसके बाद तो वो मेरा बनाया हर व्‍यंजन फेसबुक पर डालने लगी। उन पर आए कमेंट्स पढ़ने के चाव में मैं भी कंप्‍यूटर पर बैठने लगी और धीरे-धीरे दूसरी कुकिंग वेबसाइट्स भी देखने लगी। फिर अपनी एक वेबसाइट बनाई और उस पर नए-नए व्‍यंजन डालने लगी। धीरे-धीरे लोगों को मेरी रेसिपीज़ बहुत पसंद आने लगीं और मेरा हौंसला बढ़ता गया।’’

मानसी हैरान थी। कविता स्‍कूल के दिनों से ही बेहद अंतर्मुखी थी। पढ़ाई में भी उसे औसत ही कहा जा सकता था पर आज उसने भोजन पकाने जैसे अपने साधारण-से शौक को आगे बढ़ाकर एक मुकाम हासिल कर लिया था और एक वह है, पढ़ाई-लिखाई में शुरू से अव्‍वल रहने के बावजूद दिन-रात किलसती रहती है। क्‍यों नहीं वह खुद अब तक अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन के लिए नौकरी से इतर कोई मंच खोज पाई? यही सब सोचते-सोचते मानसी घर लौट आई।

कविता से कुछ घंटों की मुलाकात ने उसके व्‍यक्तित्‍व को झकझोर कर रख दिया था।  अब जैसे ही खाली समय मिलता मानसी अपने नए मोबाइल में इंटरनेट के जरिए नई-नई चीज़ें देखतीं और ज्ञान के इस अथाह समुद्र को देखकर हैरान रह जाती। धीरे-धीरे उसने इंटरनेट पर कुछ ऐसी कंपनियों से संपर्क किया जो घर बैठे ही लेखन और अनुवाद का काम देती थीं और ईमेल के ज़रिए ही काम पूरा करके भेजना होता था। इस काम से उसे आमदनी तो बहुत ज्‍यादा नहीं होती थी लेकिन इससे मानसी का व्‍यर्थताबोध ज़रूर दूर हो गया था। उसका आत्‍मविश्‍वास भी बढ़ता जा रहा था। अब वह इंटरनेट पर खुद ही बिजली, टेलीफोन आदि के बिल जमा करवाने लगी थी। फेसबुक पर उसने अ‍पनी पुरानी सहेलियों और रिश्‍तेदारों को खोजने का अभियान छेड़ दिया था और कितने ही भूले-बिसरे रिश्‍तों से एक बार फिर स्‍नेह-सूत्र जुड़ गया था। एक छोटे-से मोबाइल ने उसका जीवन बदलकर रख दिया था। अखबार के ई-संस्‍करण भी उस छोटी-सी स्‍क्रीन पर सिमट आए थे। यू-ट्यूब पर देखे प्रेरक वक्‍ताओं के भाषण भी उसके व्‍यक्तित्‍व को एक नया ही रंग दे रहे थे। यहां तक कि अवनि को नए रचनात्‍मक तरीके से पढ़ाने के लिए भी इंटरनेट बहुत अच्‍छा स्रोत साबित हो रहा था।

अचानक डोरबैल की आवाज़ से उसके विचारों का क्रम टूटा। चाय का पानी खौल-खौलकर आधा रह गया था। उसने फटाफट गैस बंद करके दरवाज़ा खोला। सोसाइटी का गार्ड एक लिफाफा लिए खड़ा था। अपने नाम का लिफाफा देखकर उसे कुछ अचरज हुआ। खोला तो उसमें दो हज़ार रुपए का एक चैक था। साथ में एक पत्र था जिसमें अत्‍यंत संक्षेप में लिखा था, आपके द्वारा भेजा गया लेख हमारी प्रतिष्ठित पत्रिका सुखदा में प्रकाशन के लिए चयनित हुआ है। बधाई! मानदेय राशि का चेक संलग्‍न है। मानसी की खुशी का पारावर नहीं था। कितने ही वर्षों बाद आज उसके हाथों में खुद उसकी कमाई थी...उसकी आंखों से खुशी के आंसू झरने लगे। उसने फटाफट अपना मोबाइल उठाया और टाइप करने लगी, ‘‘शुक्रिया विवेक ! एक ब्रेण्‍ड न्‍यू लाइफ़ के लिए।’’